खुसूर-फुसूर घर से शुरूआत…  मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल लोग जुडते गए कारवां बनता गया

खुसूर-फुसूर

घर से शुरूआत…

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल लोग जुडते गए कारवां बनता गया… कुछ इसी तर्ज पर जिले के ग्रामीण क्षेत्र के एक शिक्षाविद ने सिर्फ नाम ही नहीं कमाया उसके लिए उन्होंने समाज को क्रांति का पथ अपने घर से दिया है। समाज की प्रमुखता स्वीकार करके मात्र दिखावा ही नहीं किया उसके लिए समाज में उदाहरण भी पेश किया है। आमतौर पर क्रांतिकारी विचारधारा से प्रेरित इस शख्स ने अपने कर्मों से अपने धर्म को साबित किया। कभी वे पर्यावरण को लेकर संकल्प करते हुए पौधों का रोपण करते हैं तो कभी वे कन्या शिक्षा को बढावा देने के लिए आगे आते हैं। यही नहीं अंतिम संस्कार स्थलों की दुर्गति स्थितियों को भी वे सुधार की दशा और दिशा देने में पीछे नहीं हटते। शिक्षा से जुडे इस शख्स ने साबित किया है कि समाज सुधारने के लिए पहल खुद के घर से और खुद से करना होती है और उसे इस शख्स ने अंजाम देने में कोई देरी नहीं की । वर्तमान समाज में जहां चांदी की चमक के आगे सभी नत मस्तक हो रहे हैं इस शख्स ने एक नया संदेश देते हुए उसे ससम्मान वापसी कर दिया। दहेज को दान मान कर लेने वालों के सामने इस दृढ इच्छा शक्ति के शख्स ने ये परिवर्तन की बयार लाकर खडी कर दी है। जिस समाज में सर्वाधिक इसका चलन है उसी समाज के करीब डेढ हजार से अधिक रिश्तेदारों के समक्ष उन्होंने उसका त्याग कर जता दिया कि यह एक कुरीति है इसके त्याग करने का समय आ चुका है। खुसूर-फुसूर है कि बिरले ही होते हैं वो लोग जो धारा से विपरित बहकर अपनी पहचान बनाते हैं।महापुरूष अलग से नहीं आए उन्होंने भी अपनी क्रांतिकारी सोच से समाज को नई दिशा और दशा दी थी। उनके कर्मों से ही वे महापुरूष बने और समाज आज उनका अनुसरण करता है।

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